मोदी सरकार ने मनरेगा की मूल आत्मा को ही खत्म करके श्रमिकों से काम का अधिकार छीना है मनरेगा कानून में परिवर्तन मोदी सरकार का श्रमिक विरोधी कदम है। यह महात्मा गांधी के आदशों पर कुठाराघात है, मजदूरों के अधिकारों को सीमित करने वाला निर्णय है। मोदी सरकार ने ‘सुधार’ के नाम पर झांसा देकर लोकसभा में एक और बिल पास करके दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी स्कीम मनरेगा को खत्म कर दिया है। यह महात्मा गांधी की सोच को खत्म करने और सबसे गरीब भारतीयों से काम का अधिकार छीनने की जान-बूझकर की गई कोशिश है। अब तक, मनरेगा संविधान के आर्टिकल 21 से मिलने वाली अधिकारों पर आधारित गारंटी थी। नया फ्रेमवर्क ने इसे एक कंडीशनल, केंद्र द्वारा कंट्रोल की जाने वाली स्कीम में बदल दिया है। मनरेगा गांधीजी के ग्राम स्वराज, काम की गरिमा और डिसेंट्रलाइज्ड डेवलपमेंट के सपने का जीता-जागता उदाहरण था, लेकिन इस सरकार ने न सिर्फ उनका नाम हटा दिया है, बल्कि 12 करोड़ मनरेगा मजदूरों के अधिकारों को भी बेरहमी से कुचला है। दो दशकों से, मनरेगा करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए लाइफलाइन रहा है और कोविड-19 महामारी के दौरान आर्थिक सुरक्षा के तौर पर जरूरी साबित हुआ है। अब तक मनरेगा मजदूरों को काम देने का कानून था, श्रमिक अधिकार पूर्वक मांग करते थे, जिसे योजना में परिवर्तित कर दिया गया, अब इसे चलाना नहीं चलाना सरकार की मजर्जी पर निर्भर होगा। मनरेगा के तहत, सरकारी ऑर्डर से कभी काम नहीं रोका गया। नया सिस्टम हर साल तय टाइम के लिए जबरदस्ती रोज़गार बंद करने की इजाजत देता है, जिससे राज्य यह तय कर सकता है कि गरीब कब कमा सकते हैं और कब उन्हें भूखा रहना होगा। एक बार फंड खत्म हो जाने पर, या फसल के मौसम में, मज़दूरों को महीनों तक रोज़गार से दूर रखा जा सकता है।

मनरेगा केंद्रीय कानून था 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाते थे. अब केंद्र और राज्य का हिस्सा 60-40 का हो जाएगा पहले मैचिंग ग्रांट 50 प्रतिशत राशि राज्य जमा करेगी तब केंद्र सरकार राशि जारी करेगा, राज्यों की वित्तीय स्थिति सर्वविदित है। इस बिल से आने वाले समय में मनरेगा स्कीम खत्म हो जाएगी। जैसे ही बजट का बोझ राज्य सरकारों पर पड़ेगा, वैसे ही धीरे-धीरे मनरेगा बंद होने लगेगी। मोदी सरकार अब राज्यों पर ‘जी राम जी का लगभग 50,000 करोड़ का बोझ डालना चाहती है, उन्हें 40 प्रतिशत खर्च उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। मनरेगा योजना देश के गरीब से गरीब लोगों के लिए रोजगार का सहारा थी, जो कोरोना जैसे मुश्किल हालातों में भी उनके साथ थी। इसलिए ये बिल गरीब मजदूरों के खिलाफ है। 100 दिन से 125 दिन की मजदूरी वाली बात सिर्फ एक चालाकी है, वर्तमान में छत्तीसगढ़ के 70 प्रतिशत गांव में भाजपा की सरकार आने के बाद से अघोषित तौर पर काम नहीं दिया जा रहा है। पिछले 11 सालों में मोदी सरकार बनने के बाद मनरेगा में काम देने का राष्ट्रीय औसत मात्र 38 दिनों का है। मतलब 11 सालो में मोदी सरकार किसी भी साल 100 दिन काम नहीं दे पाई। मनरेगा काम करने का सही अधिकार था, उसे अब एक एडमिनिस्ट्रेटिव मदद में बदला जा रहा है, जो पूरी तरह से केंद्र की मर्जी पर निर्भर है। भाजपा भगवान राम के नाम पर एक बार फिर झूठ बोल रही है। “V.B.G.RAM.G.” में जो राम जी बता रहे उसमें कही भी भगवान राम नहीं है। “V.B.G.RAM.G.” का फूल फार्म है (विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन-ग्रामीण) है।मनरेगा को कैसे कमजोर किया मनरेगा में (पहले था) हर परिवार को न्यूनतम 100 दिनों के काम की कानूनी गारंटी मिलती थी हर गांव में काम की कानूनी गारंटी मिलती थी आप पूरे साल काग की मांग कर राकते णे आपको कानूनी न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी गई थी ग्राम पंचायत के जरिए अपने ही गांव के विकास के लिए काम मिलता था आपके काम में मनरेगा मेट और रोजगार सहायकों की मदद मिलती थी आपकी मजदूरी का 100 प्रतिशत भुगतान केंद्र सरकार करती थी, इसलिए बाज्य सरकार बिना किसी चिता या कठिनाई के आपको काम उपलब्ध कराती थी मोदी सरकार ने क्या बदला (जी राम जी) अब आपके पास कोई कानूनी गारंटी नहीं रहेगी काम केवल मोदी सरकार द्वारा चुने गए गांवो में ही मिलेगा फरान कटाई के गौराग में आपको काग नहीं मिलेगा आपकी मजदूरी सरकार अपनी मर्जी से तय करेगी अब आप कहां और क्या काम करेंगे, यह सरकार तय करेगी अब आपको किसी मेट या रोजगार सहायक की मदद नहीं मिलेगी अब राज्य सरकारों को आपकी मजदूरी का खर्च 40 प्रतिशत हिस्सा खुद देना होगा बचाने के लिए हो सकता है राज्य मजदूरों को काम ही न

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